Sunday, 12 April 2020

उधेड़बुन

उधेड़बुन



कच्ची नींद की मानिंद हालत में
मैंने देखा, सो गयी है रात,
पर नहीं सोयी कुछ महत्वाकांक्षी आँखें
कुछ बेतरतीब किताबें,
जो फटे अखबारों की ज़िल्द में उकता रहीं हैं

मैंने देखा, सो गयी है रात,
पर नहीं सोयी कुछ ऊमस और गर्मी से अकुलाई आँखें
जो टूटे छप्पर से नीली आसमानी रोशनी को निहार रहीं हैं

मैंने देखा, सो गयी है रात,
पर नहीं सोए कुछ श्वान
जो मच्छरों से जूझते, चीखते-चिल्लाते
रखवाली करते आँखें भींच रहे हैं

मैंने देखा, सो गयी है रात,
पर नहीं सोयी कुछ हडबडाई माँएं
जो बच्चों का डब्बा बनाने उन्हें नींद से जगाने
सुबह की बाट जोह रहीं हैं

मैंने देखा, सो गयी है रात,
पर नहीं सोयी दूधिया रोशनी में नहाती रातरानी
जो मनभर बिखरा रही है भीनी खुशबू, इतरा रही है
और पूनम की रात मुस्कुरा रही है

मैंने देखा, सो गयी है रात,
पर नहीं सोयी कुछ लोरियां, थपकियाँ और कहानी की सफेद परियां
जो बच्चों को नींद सुलाने माँएं झपकियों में बसर कर रही हैं

और आख़िर में मैंने देखा कि चादर की सिलवटें,
मेज़ पर रखी अधूरी कविता, पंखे की तीन टाँगें भी
पौ फ़टने के इंतज़ार में सकुचा रहीं हैं

अर्चि





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