
जो मेरी सशक्ति की अनदेखी करते हो,
तो फिर क्यूँ मेरी अभिव्यक्ति किया करते हो?
लगता है मुझे इंसा से कुछ परे समझते हो,
इसलिए मुझे बरसों-बरस लिखा करते हो!
जब-जब देवियों की पूजा करते हो,
तब-तब मेरी अस्मत लूटा करते हो!
तब अपने पुरुषसत्ता का विरोधाभास तय किया करते हो !
जब मेरी ज़रा सी अदा पर इतना गिरा करते हो,
तो क्या खाक अपनी बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन किया करते हो!
जो अपनी औरत को घर में सहेजा करते हो,
फिर क्यूँ दूसरी औरतों पर आँखें तरेरा करते हो?
जब मुझसे नज़रें झूका चलने कहते हो,
फिर क्यूँ अपनी नज़रों से मेरे वक्षों को नापा करते हो?
मैं नर्मदा सी अनछुई,
तुम क्यूँ घाट-घाट फिरा करते हो?
लेकर ज़माने की तल्खियाँ,
क्यूँ मुझमें पाप धोया करते हो?
विधवा की सफेदी में भी,
रंगीनियत किया करते हो!
जब मनाते हो ये दिवस ये वार,
तब स्त्री को किस तराजू में तोला करते हो?
No comments:
Post a Comment