Tuesday, 11 December 2018

माँ



माँ तेरी नरम थपकियाँ, गरम हथेलियाँ और मीठी लोरियां
मेरे अवचेतन मन में समायी सी हैं |
 
जब भी ,चोटिल होता है मन, बोझिल होता है तन
तब असमय ही गहराती है तुम्हारी याद जाड़े की किसी लम्बी रात की तरह |

आ चुकी है मुझमे कभी ना सकने वाली तटस्थता |
कुछ अधमरी जिज्ञासाएं नहीं पूछती अब जवाब |

तुम्हारे खाने के अधपके खयाल
चूल्हे कीआंच पर रखकर परिपक्व हो गये हैं |

तुम्हारी  डांट और झल्लाहट की गूँज
मिश्री में घुलनशील तरल की तरह कानों में हिल-मिल रहे हैं |

तुम्हारी कही हुयी अनसुनी बातों को भी सुन लिया मैंने
फिर भी कल पूरा सा और आज अधूरा सा है |

नहीं मिलती अब तुम्हारे होने से वह घर की रोशनी
किसी बड़े शहर की असंख्य बत्तियों के झिलमिलाहट में |

सूरज की किरणों का सीधा सा संपर्क है  अब मुझसे,
जो जगा देती हैं, जिम्मेदारियों को ज़ेहन में,
फिर लाख कोशिशों बाद नहीं आती बेफिक्री वाली नींद |

तुम्हारी मार्मिकता को क्षत-विक्षत करने की परिणति के नियतिवाद
को झेलना पीड़ादायी है माँ |

सम्पूर्ण जगतका अर्थ है माँ , तुम बिन सब कुछ व्यर्थ है माँ |


No comments:

Post a Comment